|
वापस सामान्य जानकारी भारत के संविधान के अनुच्छेद 315 से 323 संघ तथा राज्यों के लोक सेवा आयोगों की स्थापना, अध्यक्ष तथा सदस्यों के पदों पर नियुक्ति, उनकी सेवा की शर्तों, लोक सेवा आयोगों के कार्यों आदि को नियंत्रित करते हैं. भारत के संविधान का अनुच्छेद 320 भारत में लोक सेवा आयोगों के कृत्यों पर प्रकाश डालता है. अनुच्छेद 320 - लोक सेवा आयोगों के कृत्य 1. संघ लोक सेवा आयोग और राज्य लोक सेवा आयोगों का यह कर्तव्य होगा कि वे क्रमश: संघ की सेवाओं तथा राज्यों की सेवाओं में नियुक्तियों के लिए परीक्षाओं का संचालन करें. 2. 3. यदि संघ लोक सेवा आयोग से कोई दो या अधिक राज्य ऐसा करने का अनुरोध करते हैं तो उसका यह भी कर्तव्य होगा कि वह ऐसी किन्हीं सेवाओं के लिए , जिनके लिए विशेष अर्हताओं वाले अभ्यर्थी अपेक्षित हैं , संयुक्त भर्ती की स्कीमें बनाने और उनका प्रवर्तन करने में उन राज्यों की सहायता करें . 4. 5. यथास्थिति , संघ लोक सेवा आयोग या राज्य लोक सेवा आयोग से- (क) (क) सिविल सेवाओं में और सिविल पदो के लिए भर्ती की पध्दतियों से संबंधित सभी विषयों पर ; (ख) (ग) सिविल सेवाओं और पदों पर नियुक्ति करने में तथा एक सेवा से दूसरी सेवा में प्रोन्नति और अंतरण करने में अनुसरण किए जाने वाले सिध्दांतों पर और ऐसी नियुक्ति , प्रोन्नति या अंतरण के लिए अभ्यर्थी की उपयुक्तता पर ; (घ) (ङ) ऐसे व्यक्ति पर , जो भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार की सिविल हैसियत से सेवा कर रहे हैं , प्रभाव डालने वाले , सभी अनुशासनिक विषयों पर , जिनके अंतर्गत ऐसे विषयों से संबंधित अभ्यावेदन या याचिकाएं हैं ; (च) (छ) ऐसे व्यक्ति द्वारा उसके संबंध में , जो भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन या भारत में क्राउन के अधीन या किसी देशी राज्य की सरकार के अधीन सिविल हैसियत से सेवा कर रहा है या कर चुका है , इस दावे पर कि अपने कर्तव्य के निष्पादन में किए गए या किए जाने के लिए तात्पर्यित कार्यों के संबंध में उसके विरूध्द संस्थित विधिक कार्यवाहियों की प्रतिरक्षा में उसके द्वारा उपगत खर्च का , यथास्थिति , भारत की संचित निधि में से या राज्य की संचित निधि में से संदाय किया जाना चाहिए ; (ज) (झ) भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार या भारत में क्राउन के अधीन या किसी देशी राज्य की सरकार के अधीन सिविल हैसियत में सेवा करते समय किसी व्यक्ति को हुई क्षतियों के बारे में पेंशन अधिनिर्णीत किए जाने के लिए किसी दावे पर और ऐसे अधिनिर्णय की रकम विषयक पेंशन पर ; परामर्श किया जाएगा और इस प्रकार उसे निर्देशित किए गए किसी विषय पर तथा ऐसे किसी अन्य विषय पर , जिसे यथास्थिति , राष्ट्रपति , या उस राज्य का राज्यपाल उसे निर्देशित करे , परामर्श देने का लोक सेवा आयोग का कर्तव्य होगा . परंतु अखिल भारतीय सेवाओं के संबंध में तथा संघ के कार्यकलाप से संबंधित अन्य सेवाओं और पदो के संबंध में भी राष्ट्रपति तथा राज्य के कार्यकलाप से संबंधित अन्य सेवाओं और पदो के संबंध में राज्यपाल उन विषयों को विनिर्दिष्ट करने वाले विनियम बना सकेगा जिनमें साधारणतया या किसी विशिष्ट वर्ग के मामले में या किन्हीं विशिष्ट परिस्थितियों में लोक सेवा आयोग से परामार्श किया जाना आवयक नहीं होगा . 1. खंड (3) की किसी बात से यह अपेक्षा नहीं होगी कि लोक सेवा आयोग से उस रीति के संबंध में, जिससे अनुच्छेद 16 के खंड (4) में निर्दिष्ट कोई उपबंध किया जाना है या उस रीति के संबंध में, जिससे अनुच्छेद 335 के उपबंधों को प्रभावी किया जाना है, परामर्श किया जाए . 2. राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल द्वारा खंड (3) के परंतुक के अधीन बनाए गए सभी विनियम, बनाए जाने के पचात् यथाशीध्र, यथास्थिति, संसद के प्रत्येक सदन या राज्य के विधान-मंडल के सदन या प्रत्येक सदन के समक्ष कम से कम चौदह दिन के लिए रखे जाएंगे और निरसन या संशोधन द्वारा किए ऐसे उपांतर कृत्यों का स्थानीय निकायों आदि तक विस्तार अनुच्छेद 321 संसद को लोक सेवा आयोगों के कृत्यों का किसी विधि द्वारा अथवा किन्हीं लोक संस्थाओं द्वारा गठित किसी स्थानीय प्राधिकारी या अन्य निगमित निकाय तक विस्तार करने का अधिकार भी देता है . छूट इस दृष्टि से कि राश्ट्रीय सुरक्षा अथवा कुछ अन्य कारणों से कुछ पदों को आयोग की उसकी सलाह के लिए भेजने की आवयकता नहीं होगी . इस उद्देश्य के लिए, संविधान के अनुच्छेद 320(3)(क)तथा(ख) के अंतर्गत 1 सितम्बर 1958 को संघ लोक सेवा आयोग ;परामर्श से छूट विनियम जारी किए गए . आवश्यकता पड़ने पर इन विनियमों में संशोधन अथवा परिशोधन किया जाता है . भर्ती एवं सेवा आदि की शर्तें संविधान के अनुच्छेद 309 तथा अनुच्छेद 311 में अंतर्विष्ट उपबंधों को, संविधान के अनुच्छेद 320 में अंतर्विष्ट उपबंधों के साथ सहयोजित करके पढ़ा जाना भी अपेक्षित है . |